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Wednesday, April 29, 2009

प्यार करना है तो मुझ से कर

तेरे दीदार को हैं मेरी आखें तरस गयी

आजा अब तो मौसम की हर रुत बरस गयी

तेरे बिना मैं अकेला तन्हा

 दुनिया की हर कुशी से अन्जां

 

तेरे इंतज़ार में यह आखें थक गयी

मानो ज़िन्दगी की जैसे रफ़्तार थम गयी

अब आ जालिम और न सता

अपनी याद में मेरे दिल को और न रुला

 

मारना है तो मुझे अपने हुसन से मार

जुदाई में क्या रखा है

प्यार करना है तो मुझ से कर

इस खुदाई में क्या रखा है

मैं और मेरा दिल

मैं :
ए मेरे दिल यह तुझे हुआ क्या है
क्यूँ तू आज इस ज़माने से खफा है
क्या भूला है तू हमेशा कुश रहने की बात
क्यूँ बहा रहा है अपने अन्दर के ज़ज्बात

दिल :
कब तक मैं तेरे दुखो को छुपता जायूँगा
कब तक मैं कुशी से जिंदा जलता जायूँगा
मरता हूँ पल पल झूटी जिंदगी जी कर
हस्ता हूँ ऊपर रो रो के भीतर!!!

हमारी सदी का गम

बढ रही है नफरते प्यार हो रहा है कम
आदमी ही आदमी पर कर रहा सितम
इंसान में इंसानियत हो रही ख़तम
यही हमारी सदी का है गम

पैसा और दौलत के पीछे भाग रहे हैं हम
भूल गए दोस्ती और मोहब्बत का रहम
बस जीते हैं एक मशीन की तरह हम
यही हमारी सदी का है गम

महफिले

महफिले हैं यहाँ महफिले हैं वहाँ
फिर भी न जाने मैं क्यूँ तन्हा
यह महफिले यह महखाने सब है झूठे
फिर कैसे न मन मेरा इस दुनिया से रूठे

जीना तो होगा यह मैं जनता हूँ
इसलिए हर गम में मुस्कराता हूँ
झूटी हसी में सच्चाई ढूँढता हूँ
इंसान में इंसानियत ढूद्ता हूँ

कुछ ज्यादा नहीं मांगता मैं जालिम ज़माने से
बस थोडी सी वफ़ा थोडा जाम कुशी के पयमाने से
दे सको दो दिल में थोडी जगह दे देना
अर्थी पर आकर झूठे आंसू मत बहा देना